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Wednesday, 26 January 2011

happy-repuliceday

सभी भारतीयों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाए !

Sunday, 2 January 2011

meen--ka--svbhav

          राशी के प्रथम चरण में मेष एवं अंतिम चरण में मीन आता है! पूर्वाभाद्रपद के अंतिम चरण से रेवती नक्षत्र
के अंतिम चरण तक मीन राशी बिधमान रहती है! इस राशी का स्वामी गुरु है!
          इस लग्न में जन्म वाला जातक लग्न का स्वामी शुभ होने पर  सुंदर, रूपवान,धनी, ईमानदार अपने कार्य में
निष्ठां रखने वाला एवं कार्य क्षेत्र में माननीय पद पर पहुँचने वाला एवं सीधे स्वभाव वाला जरूरत मंद व्यक्ति की मदद
करने वाला होता है, एवं लेखक या कवि बनाने के योग बनते है! परन्तु लग्न में क्रूर ग्रह स्थित हो, या उसकी द्रष्टि
पड़ रही हो,तो जातक मादक द्रव्य लेने बाला या व्यभिचारी शराबी हो सकता है, अथवा होने के प्रबल योग रहते है!
लेखक, दुसरो की हमेशा सहायता करने वाला, गुप्त बिधा का ज्ञाता, देश भक्ति रखने वाला  व्यक्ति इसी लग्न में
पैदा होता है! इस लग्न के जातक समाज सेवी, राजनीती, तथा स्वास्थ्य सेवा में नर्स की नॉकरी करना ज्यादा पसंद
करते है!
          लग्नेश गुरु  तीसरे भाव में हो, तो भैयो की संख्या ज्यादा एवं बारहवे भाव में हो, तो पिता से सहयोग की सम्भावना बड़ती है!
        मीन लग्न में  उत्पन्न जातक की कुंडली में सातवे भाव में शनी या शुक्र की द्रष्टि पड़ जाये, तो तो पत्नी से तलाक होने संभावना बड़ जाती है!
        मीन लग्न में यदि शुक्र उच्च का हो तो व्यक्ति संगीत में रूचि रखने वाला, कलाकार बनाता है!
         मीन लग्न की कुंडली में मंगल बारहवे भाव में होने पर या उसकी दशा महादशा आने पर  किसी भी विभाग या
   देश का शासक बनाता है! परन्तु यदि शनी की द्रष्टि पड़ रही हो, तो जेल भिजवा सकता है!
         लग्नाधिपति गुरु यदि पंचम भाव में विराजमान हो, तो अनेक प्रकार की यात्रा करवाता है, एवं गुरु महादशा में उच्च पद पर पहुँचाता है!
         इस लग्न में बुध अच्छा नही होता है, इसकी (बुध) की महादशा में स्थान परिवर्तन कराता है! यदि बुध व्यय भाव में बैठा है, तो ग्रहस्थी में स्वास्थ्य खराब, मित्र, परिवार से झगडा करा सकता है!
      मीन लग्न वालो ने पुखराज धारण करना चाहिए!

      इति शुभम
 

Saturday, 1 January 2011

happy--new--year--2011

                         
                                                                                                             जय श्री क्रष्ण                 
सभी पाठको को नवबर्ष की शुभकामना ! नवबर्ष आप सभी के लिए मंगलमय हो! श्री क्रष्ण आप सभी को हर कदम
पर उन्नति एवं सुख- वैभव प्रदान करे! इसी कामना के साथ आपका
        पंडित सुरेन्द्र बिल्लोरे देवास
           (म. प्र.) भारत मो, ९८९३०७६३६५, 9479833629.

Tuesday, 28 December 2010

kundli me rahu ki drsht yevm fal

            पिछले लेख में आपने पढ़ा कुंडली में प्रथम भाव से अष्टम भाव तक राहू की द्रष्टि पड़ती है, तो जातक को क्या सुभ- अशुभ फल देता है! आगे पढ़े नवम भाव से ध्दाद्श भाव तक राहू की द्रष्टि का जातक पर शुभ- अशुभ प्रभाव !
नवम भाव--> राहू की  पूर्ण द्रष्टि नवम भाव पर पड़ती है, तो जातक को आर्थिक- सम्पन्न, भोगी पराक्रमी एवं सन्तति -वान बनाता है! परन्तु बड़े भाई के सुख से वंचित कर देता है!
दशम भाव --> राहू पूर्ण द्रष्टि से दशम भाव को देखता है, तो राजसम्मान एवं उधोग वाला बनाता है, परन्तु माता -
विहीन बना सकता है! एवं जातक के पिता को कष्ट देता है!
एकादश भाव --> राहू पूर्ण द्रष्टि से एकादश भाव को देखता है, तो जातक को अल्प लाभ देता है! इसी के साथ जातक सन्तति कष्ट के साथ नीच कर्म में रत रहता है!
ध्दाद्श भाव --> राहू पूर्ण द्रष्टि से ध्दाद्श भाव को देखता है, तो जातक को शत्रुनाशक,कुमार्गी एवं गलत धन खर्च करने वाला एवं दरिद्री बनाता है!
विशेष --> राहू कुंडली में लग्न श्थान पर कर्क अथवा व्रश्चिक राशी का हो,तो जातक  सिध्दी प्राप्त कर ख्याति प्राप्त करता है! परन्तु राहू धनु अथवा मीन राशी का हो, तो पिशाच व्रत्ति उत्पन्न करता है!
                 राहू यदि शुभ श्थान में हो अथवा शुभ प्रभाव दे रह हो, तो जातक जीवन में  किसी जुआरी, शराबी या अपराध करने वाले के  सम्पर्क में रहने पर भी शुद्ध एवं, सात्विक प्रव्रत्ति का रहता है! 
           राहू कुंडली में अलग - अलग भाव में रहने पर जातक को क्या शुभ- अशुभ प्रभाव देता है, जानने के लिए
पढ़े आचार्य सुरेन्द्र. ब्लोग्सपोत.कॉमं
                                   इति शुभम                        
      

kundli me rahu ki drsht yevm fal

            राहू की द्रष्टि कुंडली में जब अलग -अलग भाव पर  पड़ती है, तो जातक पर क्या शुभ- अशुभ प्रभाव
पड़ता है! जानिये
प्रथम भाव में द्रष्टि -->राहू जब पूर्ण द्रष्टि से प्रथम भाव को देखता है, तो जातक को शारीरिक रोगी, वातविकारी,
उग्र-स्वभाव बाला एवं उधोग से अलग करता है! इसी के साथ अधार्मिक प्रवत्ति का एवं खिन्न चित्तवाला बनाता है!
द्धितीय भाव --> राहू जब पूर्ण द्रष्टि से दुसरे भाव को देखता है, तो जातक को धन नाश देता है, चंचल प्रवत्ति के
साथ परिवार से सुख-हीन बना देता है!
तृतीय भाव -->राहू जब पूर्ण द्रष्टि से तृतीय भाव को देखता है, तो पराक्रमी बनाता है, परन्तु पुरुषार्थी एवं सन्तानहीन
बनाता है!
चतुर्थ भाव -->राहू जब पूर्ण द्रष्टि से चतुर्थ भाव को देखता है, तो उदररोगी, मलिन बनाता है, इसी के साथ उदास एवं साधारण सुख देता है!
पंचम भाव -->राहू पूर्ण द्रष्टि से पंचम भाव को देखता है, तो भाग्यशाली , धनी एवं व्यवहार कुशल बनाता है! साथ ही
संतान सुख देता है!
षष्टम भाव -->राहू पूर्ण द्रष्टि से षष्टम भाव को देखता है, तो पराक्रमी एवं बलबान बनाता है! शत्रुनाशक, व्यय करने
वाला, एवं नेत्र पीड़ा बाला होता है!
सप्तम भाव -->राहू पूर्ण द्रष्टि से सप्तम भाव को देखता है, तो धनवान बनाता है, इसी के साथ विषयी कामी एवं नीच संगति करने वाला होता है!
अष्टम भाव -->राहू पूर्ण द्रष्टि से अष्टम भाव को देखता है, तो जातक को पराधीन बनाता है, इसी के साथ धननाशक,
कंठ में रोग एवं नीच कर्म करने वाला बनाता है! इसी के साथ जातक परिवार से अलग रहता है!

Saturday, 18 December 2010

mantra

                                                              ग्रह रक्षा मंत्र
                 ॐ ह्रीं चामुंड भ्रकुटी अट्टहासे भीम दर्शने रक्ष रक्ष चोरे:  वजुवेभ्य: अग्रिभ्य : स्वापदेभ्य: दुष्ट -
                                          जनेभ्य: सर्वेभ्य सर्वोपद्रवेभ्य गंडी ह्रीं हो ठ: ठ !
             इस मंत्र को १०८ बार पढ़कर मकान के चारो तरफ रेखा खीच देने से वह घर दुष्ट आत्माएं , भूत ,
 प्रेत ,चोर , डाकू तथा दुष्ट व्यक्ति या हिंसक जन्तुओ के प्रवेश का भय , बिजली गिरने व आग लगने का भय तक भी नही रहता ! किसी शुभ तिथि घड़ी नक्षत्र या चन्द्र ग्रहण सूर्य ग्रहण में दस हजार बार पाठ करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है !
                                ति मोहन  मंत्र
                          ॐ अस्य श्री सुरी मंत्र स्वार्थ वर्ण ! ऋषि इति शिपस स्वाहा !
           जिस स्त्री का पति उससे संतुष्ट न रहता हो उस स्त्री को निम्न मंत्र का १०८ बार प्रतिदिन नियम से जाप
करते हुए १०८ दिन तक पाठ करना चाहिए ! इससे पति पत्नी पर आकर्षित होगा तथा दोनों का जीवन आनन्दमय
हो जायेगा !
                               सरस्वती आकर्षण मंत्र
                                                 ॐ वाग्वादिनी स्वाहा मिन्सहरा !
                इस मंत्र को किसी भी शुभ तिथि में प्रात: उठकर नहा-धोकर पवित्र होकर सवा लाख बार जाप करने से
 देवी सरस्वती आकर्षित होकर विद्या दान देती है !
                        उपरोक्त मंत्र पूर्ण श्रद्धा के साथ करे पूर्ण लाभ होगा !

mantro ka prayog

                द्वितीय जानकारी में आपको मंत्रो का प्रयोग बता रहें है मंत्रो का प्रयोग केसे करना चाहिये एवं किस विधि से करना चाहिए ! अपने को साधक बनाने के नियम जानिये एवं किस स्थान पर करना चाहिए , जानिये !

साधना स्थल केसा हो -> मन्त्र साधना की सफलता में साधना का स्थान बहुत महत्व रखता है ! जो स्थान मन्त्र की
                                    सफलता दिलाता है सिद्ध पीठ कहलाता है ! मन्त्र की साधना के लिए उचित स्थान के रूप में
                                    तीर्थ स्थान , गुफा , पर्वत , शिखर , नदी , तट , वन , उपवन इसी के साथ बिल्वपत्र का व्रक्ष ,
                                    पीपल व्रक्ष अथवा तुलसी का पोधा सिद्ध स्थल माना गया है !
 आहार                    ->   मन्त्र साधक को सदा ही शुद्ध व पवित्र एवं सात्विक आहार करना चाहिए ! दूषित आहार
                                   को साधक ने नही ग्रहण करना चाहिए !
                                  आपके एवं जनकल्याण के लिए कुछ प्रयोग दे रहें है !
सर्व विघ्न हरण मंत्र -> ॐ नम: शान्ते प्रशान्ते ॐ ह्रीं ह्रां सर्व क्रोध प्रशमनी स्वाहा !
                                  इस मन्त्र को नियम पूर्वक प्रतिदिन प्रात:काल इक्कीस बार स्मरण करने के पश्चात मुख
                                  प्रक्षालन करने से तथा सायंकाल में पीपल के व्रक्ष की जड़ में शर्बत चढ़ाकर धूप दीप देने
                                 से घर के सभी लोग शान्तमय निर्विध्न जीवन व्यतीत करते है ! इसका इतना प्रभाव होता
                                 है कि पालतु जानवर भी बाधारहित  जीवन व्यतीत करता है !